असली बिक्री के दाम, माँगे गए नहीं
ईस्ट इंडिया कंपनी के सिक्के की असली कीमत क्या है?
1858 के बाद कंपनी का कोई सिक्का मुद्रा नहीं रहा, इसलिए उसकी कीमत वही है जो कोई संग्रहकर्ता उस किस्म और उस हालत के लिए दे। ताँबे के सिक्के आम हैं और कुछ सौ रुपये में बिकते हैं; महँगे चाँदी वाले होते हैं।
कंपनी के आख़िरी सिक्के 1858 में बने, इसलिए इस पन्ने का हर सिक्का सौ साल से कहीं ज़्यादा पुराना है:
हर सिक्का कितने में बिका
| सिक्का | पूरी बिक्री | बीच का दाम | आधी बिक्रियाँ इनके बीच |
|---|---|---|---|
| पाव आना सिक्का · East India Company · 1830s | 9 | ₹248 | ₹160–₹800 |
| पाई सिक्का · East India Company · 1830s | 4 | ₹368 | ₹356–₹394 |
| आधा पैसा सिक्का · East India Company · 1850s | 3 | ₹1,358 | ₹776–₹1,800 |
हर पंक्ति एक किस्म का सिक्का — जहाँ बेचने वाले ने साल लिखा, वहाँ एक दशक का — और कम से कम 3 बिक्रियों पर। 4 से कम हों तो आख़िरी कॉलम सबसे कम और सबसे ऊँची बिक्री है, और जहाँ दाम आपस में पाँच गुना से ज़्यादा अलग हैं वहाँ बीच का दाम नहीं दिया गया।
ईस्ट इंडिया कंपनी का सिक्का कैसे पहचानें
- 1835 से एक जैसे सिक्के। 1835 के कॉइनेज ऐक्ट से कंपनी के इलाक़ों में एक जैसे सिक्के आए। चाँदी के रुपये, अठन्नी (आधा रुपया) और चवन्नी (पाव रुपया) पर विलियम चतुर्थ का चेहरा है, और 1840 से महारानी विक्टोरिया का; चाँदी का दो आना 1841 में आया, और उस पर शुरू से उन्हीं का चेहरा है। ताँबे के सिक्कों — 1/12 आना, पाव आना और आधा आना, और 1853 से आधा पैसा — पर कंपनी का कुल-चिह्न है। दोनों पर “EAST INDIA COMPANY” लिखा है।
- कंपनी का नाम उसके राज के साथ ख़त्म। 1858 में भारत का शासन ब्रिटिश ताज ने ले लिया, और 1862 या उसके बाद की तारीख़ वाले सिक्कों पर कंपनी के नाम की जगह “INDIA” लिखा है। जिस सिक्के पर कंपनी का नाम नहीं, वह इनमें से नहीं — तारीख़ कुछ भी हो।
- तारीख़ हमेशा बनने का साल नहीं। कंपनी के ठप्पों पर एक ही तारीख़ सालों चलती रही: 1835 और 1840 की तारीख़ वाले रुपये उन सालों के बहुत बाद तक बनते रहे। तारीख़ किस्म बताती है, और कोई तारीख़ आम इसलिए है कि वह इतने लंबे समय चली।
- 1835 से पहले कंपनी की तीनों प्रेसिडेंसी — बंगाल, बंबई और मद्रास — उसके सिक्के ख़ुद बनाती थीं, कई मुग़ल ढंग के, फ़ारसी लिखावट वाले। जहाँ बेचने वाले ने कंपनी का नाम लिखा, वे बिक्रियाँ भी यहाँ गिनी गई हैं: जैसे 1833 का बंबई का पाव आना 1830 के दशक वाली पाव आने की पंक्ति में, 1835 के सिक्के के साथ है। जिस पंक्ति में दशक नहीं, उसके सिक्कों का साल बेचने वाले ने नहीं लिखा।
- “1818 का हनुमान वाला” टुकड़ा इनमें से नहीं। EAST INDIA COMPANY लिखा, हनुमान जी या राम दरबार वाला टुकड़ा आज का बना टोकन है। 1818 का हनुमान वाला सिक्का — असली या नकली? →
कंपनी के सिक्के ऑनलाइन इतने महँगे क्यों दिखते हैं
ईस्ट इंडिया कंपनी के असली सिक्कों की लिस्टिंग रोज़ लाखों में लगती है, और लिस्टिंग सिर्फ़ बेचने वाले की उम्मीद होती है। इस पन्ने का हर आँकड़ा उसकी जगह पूरी हुई बिक्री है। माँगा और बिका अलग क्यों है →
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दाम: ईस्ट इंडिया कंपनी के असली सिक्कों की वे बिक्रियाँ जो स्वतंत्र सिक्का दुकानों पर पूरी हुईं, 2026-10-21 तक। माँगे गए दाम इनमें नहीं मिलाए गए, और कोई बिक्री दो बार नहीं गिनी गई। कोई सिक्का यहाँ तभी गिना गया जब बेचने वाले ने शासक का नाम लिखा; सिर्फ़ साल से अंदाज़ा लगाकर कोई सिक्का नहीं जोड़ा गया, ताकि आँकड़े अनुमान न बनें।
ईस्ट इंडिया कंपनी के सिक्के के लिए आपसे फ़ीस माँगी जा रही है?
कंपनी का हर असली सिक्का 100 साल से पुराना है, इसलिए माँगी जाने वाली फ़ीस अक्सर “export”, “customs” या “clearance” के नाम पर होती है। असली ख़रीदार बेचने वाले से कभी पैसे नहीं माँगता।
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